Monday, 31 July 2023

बेटी

 पिछली पीढियों की

जिन स्त्रियों ने 

जाने अंजाने  सुना

क्या कर लोगी

ज्यादा पढ़कर?

कलेक्टर बनोगी?

सुनो लड़कियों

पुरूष के दिल का रास्ता

जाता है होकर पेट से!

आँखे  गड़ाकर, दिमाग खपाकर

 कितना भी पढ़ लो

कुछ काम नहीं आएगा, ये

ज्यामितीय परिमेय ।

पर रोटी अगर गोल नहीं बनी

तो तंज में तनिक भी

न बख्शा जाएगा ,तुम्हे।

वृताकार गृहस्थी में

तुम्हें गोल गोल घुमना है

ताउम्र।

रोटी का जुगाड करना

है काम पुरुषो का,

मत डालो उनमें 

अपने सपनों का खलल

मत देखो सपने,

अंतरिक्ष में भरने के उड़ान

और कसी कमीज पतलून पहन

 लेफ्ट राइट करने के ख्वाब,

हवाई किला बना सकती है 

हम औरते

हवाई जहाज उड़ाना

हमारे बस में नहीं।

साधो अपने मन को

और विकसित करो

सुघड़ गृहणी बनने के गुण।

बीता समय

सब चुपचाप सुन

होनी से कर समझौता

बांध लिया दुपट्टे और साड़ी के कोने से,

अपने सपनों को

 पिछली पीढियों की स्त्रियों ने

और

और उस गांठ को खोला

अपनी बेटियों के लिए,

उड़ने दिया उन्हें स्वतंत्र

पंखों को उनके

अपने सपनो से किया 

और मजबूत

और कहा

चल बेटी ,कदम से कदम

मिलाकर उनके साथ

जो पितृ सत्ता का  तगमा लगाकर

उड़ने , दौड़ने , अंतरिक्ष में विचरने 

का दंभ रखते हैं।

और हां

कलेक्टर तो जरूर बनना

क्योंकि पता नही

क्या छिपा है इस पदवी में

जिसके तानों से

छलनी होती आई है

कितनी ही  स्त्री

हमारी पीढ़ी और हमसे

पहले वाली पीढ़ियों में।

जिसकी जिम्मेदार 

पुरूष ही नहीं

वो स्त्रियां भी रही 

जिन्होंने बेटी जनने के बाद

उदास मन से

हर बार कहा

बेटी हुई है।

ताउम्र

 रंग अलग अलग दिखाती रही उम्र भर

जिंदगी कुछ न कुछ  सिखाती रही उम्र भर ।


ख़्वाब जो न होंगे मुकम्मल कभी

 जिंदगी उन्ही ख्वाबों को दिखाती रही उम्र भर।


जुबां चुप , आँखें करती रही बयानी

जिंदगी यूं करती रही बातें  उम्र भर ।


एक मिसरा ग़ज़ल का, न कह सकी

औरों की गजले , गुनगुनाती रही उम्र भर ।


खुश करना सबको ,मुमकिन नहीं

करती रही  समझौतों का हिसाब,उम्र भर।


कुछ तो खूबियाँ होंगी मुझमें कहीं 

पर,लोग खामियाँ ढूंढते रहे उम्र भर।


कुछ तो अनुपम नहीं मुझमें पर 

 "अनुपमा" पुकारते रहे सब, उम्र भर ।

 * हाइकु *


(1)

पूजी गयी स्त्री

जब बनी पाषाण

हर काल में।


(2)

घन प्रेम में

भीगती रही धरा

हरित हुई।


(3) 

खोइछा मिला

मायके का खजाना

पल्लू में बंधा।


(4)

रंग जाता है

काला,सफेद फोटो

आज भी दिल।


(5)

पसरा है जो

हमारे बीच मौन

वाचाल है वो।


(6)


उग आता है

कभी,कहीं, कैसे भी 

आस औ' घास।


(7)


घर गृहस्थी

पकती कविता भी

संभालती स्त्री।


(8)


धानी सपने

अंजन बने मेड़

लहलहाए।


(9)


नहीं मिलते

गूगल मैप पर

दिलों के रास्ते


 (10)

 

धूप दिखाती

बड़ी पापड़ संग

अरमानों को।


©अनुपमा झा


(हाइकु कविता तीन पंक्तियों में लिखी जाती है। हिंदी हाइकु के लिए पहली पंक्ति में ५ अक्षर, दूसरी में ७ अक्षर और तीसरी पंक्ति में ५ अक्षर, इस प्रकार कुल १७ अक्षर की कविता है। हाइकु अनेक भाषाओं में लिखे जाते हैं; लेकिन वर्णों या पदों की गिनती का क्रम अलग-अलग होता है। तीन पंक्तियों का नियम सभी में अपनाया जाता है।)

रॉस आइ लैंड

 एक उदास जजीरा,

      रॉस 

सालों से लगाए ,टकटकी

हर आने जाने वाले को

 अपने अतीत की,

अपने यौवन की

दास्तां सुनाता मिलता

कुछ शर्मसार सा ।

हमवतनों के

गुलामी के खून पसीने से

सने हाथों से सजा ,

चीख चीख कर 

अपने वजूद की दे रहा गवाही

खुद ही साक्ष्य और साक्षी बनकर

जिसे अपने अय्याशी के लिए

रौंदा गया, बसाया गया।


लाखो गुमनाम चेहरों 

के आंसुओं का सैलाब

घुल मिल गए

इस जजीरें के संग।

और यह जजीरा

सब कुछ सहते हुए

फला, फूला ,

हँसा, बसा

और आज

खंडहर बनकर भी

कर रहा है कोशिश

मुकुराने की।


अपने अतीत को

याद करता,भूलता कभी

उन दरख्तों को ,

गले लगाता , चूमता कभी

जिनके साथ

जिया है उसने हर वो लम्हा

एक जजीरे को

शहर बनाकर ।

और शायद ये सोचकर कि

दुआओ के संग

बददुआएं भी रंग लाती है,

असर दिखाती है।


अनुपमा झा

#rossisland 

#andaman

शब्दो के रंग

 कभी परखना 

शब्दों के रंग,

शोख फूलो की तरह ही 

तो बांध जाते हैं,

अपने सम्मोहन में ।

महकते, बहकते है

कविताओं में,नज्मों में,रुबाइयो में

सलीके से सजे संवरे ।

 किताबों के बीच से,

आती खुशबू

नहीं होती कमतर

किसी रजनी गंधा की खुशबू से।

छोड़ जाते हैं शब्द

कवि मन की उदासी भी

झड़ हरसिंगार से।

चुभा जाते हैं कांटे भी

तल्खियो के बीच 

हंसते शब्द।

शब्द हमेशा सुर्ख नही होते,

हर रंग से होते हैं ओत प्रोत ,

 जीवन के रंग से,

अनुभवों के रंग से।

शब्दों के गुलदस्ते में

हर रंग के फूल होते हैं,

जिन्हे चुना और छुआ जाता है

अंतस की मनोदशा और दिशा पर।

क्षणिकाएँ

 क्षणिकाएं

(1)

जिंदगी

नौ से पांच वाली ऑफिस की फाइल

जो करती  रहती अपनी यात्रा

साल दर साल

एक मेज़ से दूसरी मेज़ तक

और कभी भी हो जाती है बंद

बिना किसी निष्कर्ष के।


(२)

जिन्दगी 

एक ऐसी किताब

जिसके हर किरदार से

वाकिफ होते हैं हम

और न चाहते हुए भी

पलटते रहते हैं,

उस  किताब के पन्ने

एक नए नजरिए ,से समझने को।


(३)


जिंदगी 

किसी और के चलाए

 लूप पर चलती 

एक गाने की तरह।


(४)

जिंदगी

हर कोई साधता है 

जिसके सुर

अपने लय ताल में

सरगम से बेखबर 

अपने अंतरे और मुखड़े के संग।


(५)

जिंदगी 

कभी मीठी  कविता या गजल सी

पूरी मुकम्मल

और कभी

बिना छंद और बहर वाली

 आलोचनाओं और प्रश्नचिन्हों 

के दायरे में कैद।

Wednesday, 25 November 2020

कविता और तर्क

कविता और तर्क की हुई मुलाकात

फिर चली बात पर बात

कविता ने कुछ यूँ ,परिचय दिया

मैं कविता

कल्पना और यथार्थ 

दोनों में जीती हूँ,

पर बिन कल्पना

मैं रीती हूँ।


सुन कविता का परिचय

तर्क मुस्कुराया, बोला

देखे,पढ़े सुने हैं मैंने

तुम्हारे जज़्बात

बेमतलब की होती है

तुम्हारी हर बात!


चाँद से बातें करती हो

मेघ को दूत बनाती हो

फूल तुम्हारे हँसते गाते हैं

रात अंजन लगाते हैं।


होनी को अनहोनी करती हो

विचित्र चित्र तुम रचती हो,

विज्ञान में नही करती तुम वास

बस कवियों की कल्पना में

है तुम्हारा आवास।


बोल पड़ी कविता

क्यूँ मुझपर झल्लाते हो

माना तुम यथार्थ दिखलाते हो

पर,ज़िन्दगी की आपाधापी में

तर्कों में बस उलझते, उलझाते हो!

नज़रो में तुम्हारे

चाँद ,बस एक उपग्रह

मेरे लिए कल्पनाओं का संग्रह!

दिल तुम्हारे लिये

महज़ एक शरीर का पुर्ज़ा

जबकि लिखकर गए, इसपर

सब शायर, कवि

चाहे,जॉन,निदा या मिर्ज़ा


नज़र में तुम्हरे

गीत,ग़ज़ल बस शब्दों का पुलिंदा है

पर सुनकर उन्हें,  हर संवेदनशील जिंदा है

कल्पनाओं से तुम 

कोसों दूर भागते हो,

नहीं ख्वाबों, ख्यालों में

कुछ लिखते ,गुनगुनाते हो।


तर्क तुम्हारे पास 

हर बात की गवाही है

पर, मेरे पास

बस कल्पना और स्याही है।

पढ़कर मुझे लोग

मुझसे नाता जोड़ लेते हैं

भावनाओं की मोती,

पिरो लेते हैं!


प्रेम, विरह ,रौद्र, शृंगार

सभी रूपों में मैं जीती हूँ

ज़िन्दगी के सभी पहलुओं को

मैं शब्दों में पिरोती हूँ।

एक बार, बस एक बार

सब तर्कों को रख परे

न सोच, मैं छोटी, तुम बड़े

जैसे कंकड़ ,पत्थर हर सरिता में

न ढूंढो तर्क, हर कविता में।


तर्क की बनावट गठीली है

पर कविता!

पर कविता एक स्त्री समान लचीली है

उसका तुम भी, सम्मान करो

न बस अपने तर्क पर अभिमान करो

न बस अपने तर्क पर अभिमान करो