Friday, 21 April 2017

ख़्वाहिश

हो सारी ख्वाहिशें मुक़म्मल
   जरूरी तो नहीं
पूरा चाँद भी रात का कहाँ होता??

फ़ोन

माचिस की डिब्बी से बनाया फोन से लेकर
iPhone तक का सफर तय किया है मैंने
फोन तेरे हर बढ़ते,बदलते रूप
को देखा है मैंने
पहले मोहल्ले में एक दो फोन
हुआ करता था
सबका PP No
वही हुआ करता था
फोन के बहाने सबका
आना जाना लगा रहता था,
घर में रौनक बना रहता था
फिर हर घर फोन बजने लगा
दायरा सिमटने लगा।
जबसे तू मोबाइल बन
सबके हाथों में आया है
खुशियों के साथ
गम भी बहुत लाया है
प्यार और शिकायत
 दोनों है तुमसे
क्या कहूँ, क्या न कहूँ तुमसे
हर घर पर कर लिया कब्ज़ा
सब रिश्तों की जगह कर ली है
इख्तियार तुमने......

कारवाँ

सफर-ए -ज़िन्दगी में
ख्वाहिशों का कारवाँ जुड़ता रहा
जोड़ते रहे,बटोरते रहे
गर्द उम्र का उड़ता रहा....

गुफ़्तगू

अल्फाज़ो से बात करती हूँ
सब कहते है,लिखती हूँ
इनसे ही हँसती बतियाती हूँ
कुछ शिकायत भी करती हूँ
बातें, शिकायतें अख्तियार
कर लेती हैं शक्लें
कुछ बिखेरती सी
कुछ उकेरती सी
भावनाएँ पिघलती है
नज़्म सी दिखती हैं
पर मैं नहीं उन्हें लिखती हूँ
मैं तो बस अपने
जज़्बात बिखेरती हूँ
कुछ ख्यालात समेटती हूँ
कोरे कागज से
कुछ गुफ़्तगू कर लेती हूँ...

तेरी ख़ामोशी

तेरी ख़ामोशी से ही
बात करती हूँ,
शिकवा उनसे ही तेरी
दिन रात करती हूँ।
एक तरफा ही
सवाल और जवाब करती हूँ,
कभी तुमसे लड़ती और झगड़ती हूँ
कभी बाँहो में भरकर
तुम्हे एहसास कर लेती हूँ।
कभी मनाकर खुद को
अपने को खुश कर लेती हूँ
चाहकर भी तुम्हे
न चाहने का दिखावा कर लेती हूँ
अपनी चाहत का मनगढंत
क़िस्सा रच लेती हूँ।
तुम्हारे हिस्से का भी
किरदार निभा लेती हूँ
खुद को थोड़ा प्यार,कर लेती हूँ
तेरी कल्पना से अपनी
दुनिया रच लेती हूँ
मैं भी जरा औरों की
तरह बस लेती हूँ।
तेरी ख़ामोशियों से ही
बात करती हूँ
शिकवा उनसे ही तेरी
दिन रात करती हूँ
और बस
तेरे होने का एहसास करती हूँ......

गुल्लक यादों का

कुछ यादें हैं जमा गुल्लक में
बरसों से उन्हें छेड़ा नहीं
इकट्ठी हो रहीं हैं
आहिस्ता आहिस्ता,
आज उनको उठाकर
 टटोल रही हूँ,
और भी भारी हो चला है
कुछ  तुम्हारा हिस्सा
कुछ मेरा हिस्सा है
सब जमा हो ,घुलमिल गया है
एक दूसरे से,हमारी तरह
अब कैसे करूँ बँटवारा
कौन सा तुम्हारा,कौन सा मेरा
बहुत मुश्किल है यह सवाल
सोच रही हूँ न तोड़ू कभी
इस गुल्लक को
मिटटी ही तो है
कुछ और होता तो
लग चुका होता अबतक जंग
नहीं बचता कुछ
हमारी यादों का अंग
पर मिटटी का ये गुल्लक
गर टूटा भी तो
टूट मिटटी में ,मिल जायेगा
और मिल मिट्टी में,संग अपने
सौंधी सौंधी  यादो की खूशबू फैलायेगा

Monday, 10 April 2017

इत्र

अलमारी में कपड़ो के बीच
एक जानी पहचानी खुशबू छाई
कुछ पुरानी बातें, कुछ पुरानी यादें
जेहन में उभर आई
रखा दिखा वो रुमाल भी
छिडककर जिसपर तुमने दिया था इत्र
लिखा उसके कोने पर था मित्र
हमदोनो का था ऐसा संग
हों जैसे अभिन्न अंग
दोस्ती हमारी इत्र सी महक रही थी
पर कुछ लोगों को खल रही थी!
कैसे हो सकते स्त्री पुरुष सिर्फ मित्र
अच्छा नहीं था उनकी नज़रों में हमारा चरित्र
हमारी पवित्रता से भरी
मित्रता की शीशी तोड़ने में जुड़े थे
टूटे कैसे मित्रता इसपर अड़े थे
विश्वास की खुश्बू वाले
इत्र से हम भरे थे
फैलाकर अपनी खुश्बू दोस्ती की
हम और भी घुल मिल रहे थे
फिर परिस्थितियाँ हमारी अलग हुई
पर नहीं दोस्ती विवश हुई
जुदा होकर भी एक दूजे से
बन खुश्बू हम इत्र
तेरी याद में महक रहे
ए मित्र....