Thursday, 16 March 2017

मैं और तू

मैं तुझमें तू मुझ मे
ये हमसे बेहतर
जाने कौन
गर खफा हो मुझसे
तो कह दो
तुमको मुझसे बेहतर
पेहचाने कौन
'हम' से 'मैं'
न बन
ये डोरी बहुत उलझाती है
उलझ गए तो फिर इसको
सुलझाए कौन
बातों से बातों मिलती है
कुछ नई राहें जुड़ती है
साधने से यूँ चुप्पी
क्या हो जायेगी
सब बातें गौण
सब कुछ जुड़ा
तुमसे मेरा
अब क्या तेरा
और क्या मेरा
बनाकर दूरी, न रह यूँ
खामोश और मौन
तेरा मेरा रिश्ता
सबसे न्यारा ,सबसे प्यारा
ये तुझसे बेहतर
जाने कौन
मैं तुझमे, तू मुझमे
ये हमसे बेहतर
माने

Sunday, 5 March 2017

रफ कॉपी

घर के किसी कोने मे
दबी दबाई
सहमी सकुचाई
मुझे मिली पड़ी पुरानी 
"रफ कॉपी"
बचपन का किस्सा है
स्कूल का अहं हिस्सा है
यह "रफ कॉपी"
साफ़ सुथरी थी जहाँ
बाक़ी विषयों की कॉपी
जिल्द चढ़ी 
अकड़ी -अकड़ी,
वहीं हुआ करती थी
मस्त अल्हड़
यह "रफ कॉपी"
न घरवालों के नज़र का खौफ
न किसी टीचर के 
रोक टोक की परवाह
शायद इसलिए थी
जरा वो लापरवाह,
पर होती सबसे प्यारी थी 
वही हमारी 
यह "रफ कॉपी"
सब विषयों का सार होता था
पिछले कुछ पन्नो मे
हमारी शैतानियों का 
विस्तार होता था
राजा,मंत्री,चोर,सिपाही
आज भी दे रहा 
इस बात की गवाही,
पढ़ाई के साथ साथ 
खर्ची थी हमनें
इन खेलों पर भी स्याही
कभी किसी गाने की
दो चार पंक्तियाँ 
लिख जाया करते थे
कभी किसी दोस्त को 
कुछ लिखकर
चिढ़ाया करते थे
सब किस्सों का सारांश
यह "रफ कॉपी"
गणित के सवालों मे
जो खर्चते थे दिमाग
उसकी जोड़ घटाव का हिसाब
यह"रफ कॉपी"
चित्रकारी के जरिये
हमारे मन का इज़हार
यह"रफ कॉपी"
हमारे बचपन के दिनों के 
अल्हड़पन के गवाह 
यह "रफ कॉपी"
       काश
ज़िन्दगी के हर पड़ाव पर
होती साथ हमारी
ऐसी ही कोई 
एक "रफ कॉपी"
दुःख,तकलीफ,परेशानियों
को डाल कॉपी के 
अंतिम पन्ने पर
सकून से हमें 
जीने देती हमारी
ज़िन्दगी की 
यह "रफ कॉपी".......


Thursday, 2 March 2017

फाग

अरी ओ सखी
लेकर आ जरा गुलाल
अरे रख परे
अपना मलाल
चल झट झटक
रख अपनी परेशानियों 
को पटक
क्यूँ रही अब भी 
तमतमा
चल निकाल दे 
दिल मे जो भी है
जमा जमा
डाल मन की बलाओं को
होलिका के आगोश मे
जा फिर खेल रंग
पी के संग
पूरे होश ओ जोश मे
कर सार्थक
फाग के राग को
प्रेम की आग को
चल अब 
और न इतरा
न पिया को तड़पा
पिया संग चहक चहक
महक महक
जरा बहक बहक
ओ सखी 
न ठमक ठमक 
चल अब
मटक मटक
चुड़ियों सी
खनक खनक
पिया के प्रेम मे
लौ सी दमक दमक
अरी ओ सखी
अब ले आ गुलाल
जो जिए वही तो
खेले फाग!!!

Tuesday, 28 February 2017

ऐसे भी

अपनी वेदना ,ख्वाब
और ख्वाहिशों का बोझ उठाये
लहरों, थपेड़ो को ,हमसफ़र बनाये
बहते जाये
ज़िन्दगी के साथ रफ़्तार बनाये
जीवन मे कुछ रिश्ते ऐसे भी बनते हैं.....
              मानो दोनों
नदी के दो किनारें हों
एक दूजे के संग नहीं
फिर भी एक दूजे के सहारे हैं..
         होकर भी साथ
चल रहे साथ नहीं
न पकड़ा है हाथ अभी
न छोड़ा था साथ कभी
अपनी अनदेखी राह चले हुए
मंज़िल की आस लिए
अतृप्त प्यास लिए
जीवन मे कुछ रिश्ते
ऐसे भी बनते हैं।।!!!!!!

ऐसे कैसे

                         

बहुत गहरा रिश्ता है 
तेरा मेरा
ऐसे कैसे छूट जाएगा
क्या तेरे मेरे कहने भर से 
ये ऐसे ही टूट जाएगा?
कौन सा भ्रम 
पाले बैठे हैं हम
और सोच रहे
बस हो जायेंगे
एक दूजे से दूर
और हमें हमारी यादों से
छुटकारा मिल जायेगा
इतनी कच्ची मिट्टी से तो
बना नहीं ये प्रेम घट
जो हमारी परेशानियों से 
फूट जायेग
कुछ अधूरे रिश्ते भी 
होते हैं परिपूर्ण
तेरे मेरे चाहने से भी 
ये न बदल पायेगा!!!!!!!!

Tuesday, 3 January 2017

जाता हुआ साल


कभी जाने से तेरे
इतना बुरा नहीं लगा
कर रहा था दिल
बस रोक लूँ , तुम्हें जरा
थाम लूँ तुम्हारा दामन
जी लूँ बस
तेरे साथ गुजारा हर लम्हा
फिर से दुबारा.....
जो तुमसे मिल रहा
संभाल उसे बस
  यूँ ही पीती जाऊँ
       घूँट घूँट
प्यार से , तसल्ली से
यूँ ही ,जीती जाऊँ....
कह भी नहीं सकती
रुक भी जाओ ना
कुछ पल ख़ुशियों के
और दे जाओ ना...
किसके रोके रुके हो तुम?
किसके कहने से झुके हो तुम?
तुम तो बस एक वक़्त हो
लम्हो, दिनों, महीनो से
साल मे बदलकर
बस चल देते हो
और दे जाते हो
यादों का अंबार
कहकर ये
    मैं तो चला
    अब तू अपनी
    यादें संभाल.........



(2016 की याद मे )

Wednesday, 16 July 2014

मुक्ति

किस मुक्ति की बात करें हम
जब मन ही नहीं मुक्त ,इस संसार से
क्यूँ कर जाएँ काबा काशी
जब फंसा है मन
इस माया जाल में
खूबियों -खामियों से युक्त
कैसे हो ये मन मुक्त ?
जब तक ना होंगे उन्मुक्त हम
हो नहीं सकते मुक्त हम .........