Monday, 15 May 2017

प्रेम कथा

आज चलो लिखती हूँ
एक सच्ची प्रेम कथा
नायक, नायिका हैं जिसके
सबसे जुदा
वो लिखती थी ऐसे
सफा दर सफा
जैसे करती रौशन चिराग
लेखनी से उसके एक
निकलती थी आग।
होती थी हाथों में सिगरेट उसके
धुआँ सिगरेट का ,ऊपर नहीं
शायद पन्नो से जाता था चिपक
और पन्नो से पढ़नेवालों तलक,
जम जाती थी,सिगरेट के धूँए सी
मन मस्तिष्क पर उसकी लिखाई।
वो लिखती थी,सबसे अलग
लापरवाह, बेफिक्र सी
समाज की जिक्र सी
इश्क़ उसका था जूनून
चलता था साथ उसके
बनकर उसकी परछाईं
ज़माने से नहीं वो डरती थी
सबकुछ सरे आम करती थी
जीवन उसका था सबके सामने
एक खुली किताब,
पुरस्कार भी रहता था बेताब
देने को उसकी लेखनी को दाद
अपनी कूची से रंगों को उकेरता
नायक उसका
नायिका के भावों को रंगता
वो भाव रचती वो इनमे रंग बिखेरता
रहता उसके संग अंग जैसा
अपने पेंटिंग के रंग जैसा
साथ रहा उसके हरदम,हरपल
न समाज की चिंता
न घर की फ़िकर
बना रहा वो उसका हमदम,हमसफ़र
कलम और कूची की मित्रता
रही बनी उनके रिश्तों की प्रगाढ़ता
सबसे अलग सबसे जुदा
अमृता इमरोज़ की प्रेम कथा......




मन की मधुशाला 1 & 2

सुन्दर शब्द स्वप्न दिखाती रोज़
मेरे अल्फ़ाज़ों की हाला
मधुर,मदिर मेरे ख्यालों की
 मधुशाला
और लिखे जा
और रचे जा
शोर मचाती
मन की मधुर आकुलता
लिखकर ही मिटती फिर
ये मन की व्याकुलता।
कोरे कागज पर जब ,शब्द बिखरते
होती तसल्ली ,मद मस्त मनुष्य सी
फिर लहरों, छंदों सी बहती 
मेरे मन के शब्द ,बन मेरी कविता।
मधुशाला मैं ही अपनी
मेरे शब्द ही मेरे हाला
मैं ही अपने शब्दों की साकी
मैं ही अपने शब्दों की सहबाला.......



कोरे कागज जैसे खाली प्याला
लिखकर लगे जैसे ,भर दी हाला
मिलती नही तृप्ति
बस कुछ शब्दों से
लगती प्यासी अधर
प्यासी मन की मधुशाला
भावों को जो मेरे
भर दे लफ़्ज़ों से
घूँट घूँट पिला दे अपने हर्फों से
ऐसी हो कुछ मेरे मन की मधुशाला!
लालायित रहती कुछ रचने को
आकुल रहते शब्द हरपल सजने को
लहरों, छन्दों से भरती ,बहती
ये मेरे मन की मधुशाला....



रूठा तारा

छत पर टहल रही हूँ
चाँद तारों की
गुफ़्तगू सुन रही हूँ
एक तारा जरा रूठा सा है
शायद अंदर से कुछ टूटा सा है
दर्द को अपने छुपा रहा है
दूसरे तारों के साथ मुस्कुरा रहा है
शायद बिछड़ गया है,अपने प्यार से
सुखी नहीं शायद अपने संसार से।
मुझे ऐसा लग रहा है
चाँद उसे कुछ समझा रहा है
कर ले दोस्ती अपने प्यार से
शायद ये बता रहा है,
हमसफ़र न सही,
हमदर्द मिल जायेगा
बाँट दुःख तकलीफ उससे
तू अपने दर्द से छुटकारा पायेगा
पर वो ज़िद्दी तारा
समझ नहीं पा रहा है
बाकी तारो के साथ
यूँ ही झूठमूठ मुस्कुरा रहा है.....

नमन

हमारा महत्त्वपूर्ण ,बहुत महत्त्वपूर्ण कुछ
महानगर में खो गया था
उथल पुथल मच गयी थी ज़िन्दगी में
सबकुछ शून्य सा हो गया था।
बड़ी मुश्किल से गुजरे तीन दिन,
घंटे ,मिनट गिन गिन,
खुद को हिम्मत ,हौंसला बंधाते
एक दूसरे से "सब ठीक है"
का स्वांग रचाते,
पर स्वांग भी रंग ला गया
ऊपरवाले को भी तरस आ गया।
एक अनजान इंसान को
मिला हमारा सामान
बनकर आया वो रूप भगवान
लौटा गया वो सबकुछ
घर का पता देखकर
अपना बहुमूल्य समय देकर
शब्द नहीं उसके लिए हमारे पास
जगा गया वो इंसानियत में हमारी आस
पुनः पुनः नमन उस शख्स को
जो बना गया हमारे जीवन में
अपनी जगह खास
दिखा गया इंसानियत में आस
सीखा गया आस्था और विश्वास का पाठ।



मेघ

मेघ को दूत बनाकर,भेजूँ कुछ सन्देश
मेघ तो रहता अब दूर अपने देश
नहीं आता कितना करती मनुहार
नहीं आता अब इसको
हम इंसानो पर प्यार
कितना कहा उससे मैंने
पहुँचा दे मेरे पिया को सन्देश
जो रहते मुझसे दूर देश।
चल न पहुँचा सन्देश
यूँ ही बरस जा
थोड़ा गुस्से से ही गरज जा
भिंगो दे धरती का तन मन
कुछ तो उपजे ,किसानों का अन्न
क्रोध भाव से गरजा मेघ
ए इंसान तू खुद ही देख
तूने छोड़ा बोना पेड़
मैंने भी बरसना छोड़ा
बोलो क्यूँ मैं बरसूं
क्यूँ सिर्फ मैं ही तरसू
अब मैं नहीं मेघदूत बन सकता हूँ
तुम्हारे बनाये नियम पर नहीं चल सकता हूँ।
फिर स्वयं हुआ भान
आया यह ध्यान
अब तो बादल भी बदल गए हैं
जज़्बात इनके भी हमारे जैसे ढल गए हैं
एक हाथ से दो,दूजे से लो
ये भी हमारे से बन गए हैं....


धमकी

आँखों को दे ही डाली धमकी आज
कहा उससे मैंने
मत आ तू झांसे में दिल के
तू आँख है,दिल नहीं!
दिल का दिमाग नहीं होता
उसके पास सब सवालों का
जवाब नहीं होता
काम तेरा देखना है
सपनो को उकेरना है
तू बेशक,भटक, मटक
पर इस दिल से न लटक
न बन दिल जैसा जज्बाती
न बना कमज़ोर मुझे
नहीं मैं सह पाती
दिल को कहते है दरिया
तू मत बन उसके
बहने का जरिया
तू बहता है तो मैं भी
संग तेरे बह जाती हूँ
कमज़ोर खुद को पाती हूँ
नहीं रहना मुझे अश्कों के संग
देखना मुझे आँखों से ,सतरंगी रंग
बस बहुत हो गया
कर ली दिल ने मनमानी
अब तुझे न रहने दूंगी संग उसके
ये है मैंने ठानी
अगर अब बरसा तू तो,देख ले
मेरी ये आखरी धमकी
अट्टी ,बट्टी तुझसे सौ बरस की कट्टी......


Sunday, 14 May 2017

पेड़ और प्रेम

वो हमारी पहली मुलाकात
जब कच्चे पक्के से थे
हमारे जज्बात,
लाकर दिया था
एक पौधा तुमने
और ये कहा था
एक पौधा हूँ मैं
मुझे प्रेम वृक्ष बनाओ
अपनाकर मुझे,मेरा जीवन बचाओ।
बहुत भाया था, ये अंदाज़ तुम्हारा
फिर चढ़ा परवान,प्रेम हमारा
पूछा था मैंने फिर
किस फूल का पेड़ है?
या यूँ ही कोई बेल है?
हँसकर कहा था तुमने
बेल होगी तो फ़ैल जायेगी
मेरे इश्क़ के जुनून की तरह
और पेड़ बना तो
रहना तुम महफूज़ उसपर
एक पँछी की तरह
बनाना हमारा घोंसला
और रहना मेरे साथ
पेड़ के जड़ की तरह...
एहसास तुम्हारा सच्चा लगा था
अंदाज़ तुम्हारा ये अच्छा लगा था।
      बो दिया वो पौधा हमने
तुम्हारी ही किसी जमीन पर
तुम्हारी मुहब्बत, तुम्हारी यकीन पर
बढ़ता रहा वो पौधा ,बढ़ते रहे हमारे ख्वाब
                       फिर
उम्र कुछ बीता और बीते कुछ साल
हमारे प्रेम का हुआ
उस पौधे जैसा ही कुछ हाल
वक़्त की तरह बस बढ़ता गया
न फूल खिले उसमे
न उसने कोई छाँव दिया
बसाए उसकी हरियाली मन में
ज़माने के साथ हमारा वक़्त बहता गया।
            सालों बाद
उस पेड़ के सामने हूँ
हरियाली आज भी है ,उसकी बरक़रार,
सोचा कल सींच आऊँगी
पुराने कुछ साल जी आऊँगी,
       पर ये क्या ,
मेरे आने की शायद
उसको भनक लग गयी
रातों रात खड़ी हो गयी
पेड़ के सामने एक दिवार
जैसे कह रहे हो तुम
नहीं हूँ मैं अब
इस पेड़ के हवा की भी हक़दार........