Monday, 7 September 2020

मछलियाँ

 #मछलियाँ


नहीं रहती,

पानी में कुछ मछलियाँ

कहीं घर नहीं होता उनका,

न झील, न नदियाँ

न पोखर, न समंदर,

हर जगह ,

मछुआरों की मौज़ूदगी,का डर


और इसलिए सदियों से

ढूंढ रही है मछलियाँ

अपने लिए ,महफूज़ जगह

पर

पकड़ी जाती हैं

कभी किसी के बनाये 

कांटे में

कभी ,बिछाए जाल में।


कभी कोई हिम्मती मछली

वज़ूद की तलाश में 

पहुँच जाती है

धरती की सतह के असपास

तो पकड़ ली जाती है

यूँ ही,किसी हाथ से।


कभी मार दी जाती हैं

कभी छोड़ दी जाती हैं,

एक सुंदर से,

एक्वेरियम के अंदर

स्वतंत्रता से विचरने को।

और सोचने को मछलियों को

पानी और मछली पर्याय है

तो फिर

कौन सा पानी अपना है?

कौन सा पानी अपना है?

साहित्याकाश

 * साहित्याकाश *


साहित्याकाश में चमक रहे 

असंख्य सितारे हैं

काव्यों को नमन इनके

ये गौरव हमारे हैं

रश्मियाँ निकलती हैं "रश्मिरथी" से

"उर्वशी" से होता सौंदर्य श्रृंगार है

फूँका राष्ट्रीय चेतना जिनकी कलम ने

वो "दिनकर" की किताब है।


"खड़ी बोली" से सजी जो कविता

वो "गुप्त जी" की रचना है

करते अलग रूपों में जो

"उर्मिला""शकुंतला" की कल्पना हैं।


"छायावादी""निराला" का लेखन निराला

कथा,काव्य,नाट्य, जीवनी

सब था इन्होंने लिख डाला

"मैं" की शैली अपनाकर इन्होंने

कविता को छंदो से मुक्त किया

अपनी लेखनी अपनी कल्पना को जीवंत किया


सहज,सरल शब्दों में "बच्चन" ने

जीवन दर्शन कह डाला

"मधुशाला" के ज़रिए घूँट जीवन का पिला डाला

लहरों, छन्दों संग हुआ "हालावाद" का प्रवेश

फिर निकलीं कविताएँ अनेक।


मनु और श्रद्धा के पात्र में

सृष्टि का सार लिख डाला

चिन्ता से आनंद तक

बस पंद्रह सर्गों में

"जयशंकर जी" ने महा काव्य रच डाला

मानव सृष्टि दर्शन कि अद्भुत

ग्रंथ यह "कामायनी" है

कृति यह उनकी,अंतिम लेखनी है।


मानव और प्रकृति के सौंदर्य को

"पंत जी" ने क्या खूब किया है बयान

सारे उपमाओं, अलंकारों को

अपनी कविताओं में दिया स्थान।


"महादेवी" वेदनामय काव्य की जननी

हैं वियोग और श्रृंगार जिनकी लेखनी

काव्यों से इनकी 

फूटती भावों की धार ऐसी

जैसे बहे कोई निर्झरिणी।


हिंदाकाश में चमकते सारे

तारों को कहाँ मैं गिन पाऊँगी

उम्र गुजर जाएगी

सारों को न लिख पाऊँगी।

नमन साहित्याकाश के सब तारो को

जगमगाते उनके काव्य सितारों को।।।।

©अनुपमा झा

नहीं आसान बुद्ध होना



तुमसे मिलना मानो,

यादों की मिट्टी पर

उग आए विशाल दरख़्त की 

छाँव के नीचे बैठना।

अपनी नेह वृष्टि से भी जिसे

कहाँ भिगो पाती हूँ मैं!

बूंदे इधर उधर बिखर जाती हैं,

हर बार लगता है

तुम्हारे मन का कोई कोना

फिर रह गया सूखा....


कई बार अपने शब्दों से

तूफान सी बनकर

झंझोड़ने की कोशिश करती हूँ,

बस झड़ जाते हैं

इक्का, दुक्का शब्द तुम्हारे

पीत वर्णी पत्तों जैसे....

सारी कोशिशें हो जाती हैं नाकाम

जब तुम बस मुस्कुरा कर 

टाल जाते हो - सबकुछ


कई बार

एक छोटी सी चिड़िया बनकर

फुदकती हूँ, तुम्हारे दरख्तों पर

जो अपना घोंसला तो न बना पाई

इस वृक्ष पर 

पर बैठ जाती है

इसपर, आकर पता नही 

किस अधिपत्य से?


दिल करता है 

सच बहुत दिल करता है

वज़ूद में तुम्हारे

हो जाऊँ एकाकार 

ओस की बूंदों जैसी

जिसे कोई देख भी न पाए

पर फिर याद आते हैं

तुम्हारे  कहे शब्द


दिल का क्या है?

न मरती हैं न भरती हैं

इसकी अनंत इच्छाएं!

पर कैसे कहूँ तुम्हे 

बुद्ध बनना इतना आसान है क्या?


©Anupama jha

Friday, 4 September 2020

तर्पण

 मृत्यु,

एक शाश्वत सत्य है,

समय रुकता नहीं,

वक्त थमता नहीं,

सब जानती हूँ!

पर खुद को

समझा नहीं पायी 

आजतक!


पाँच साल  होने को आ रहा

पर आज भी, आपको याद कर

दिल रोज़ कुम्हलाता है।

"नही हो आप"

कितनी बार खुद को

समझाती हूँ

पर नहीं समझ पाती हूँ।


सुना यही है बचपन से

अपनों से मिलने पितर हमारे

स्वर्गलोक से आते हैं,

अपनों से श्राद्ध ग्रहण कर 

आशीष हमें दे जाते हैं!

आदित्य,रुद्र,वसु यह तीन

श्राद्ध के देव कहलाते हैं!

हुए संतुष्ट अगर वो

फिर पितर मुक्ति पाते हैं!


नहीं विरोध इन बातों से

पर ,आना आपका 

बस एक बार?

नहीं स्वीकार पाती हूँ।

हर वक़्त इर्दगिर्द आपको, 

मैं संग अपने, पाती हूँ।

हर  रचना अपनी

समर्पित आपको कर जाती हूँ।

प्रतिक्रिया पहली, आपकी चाहती हूँ।

पर

गलतियों और शाबाशी 

के प्रतीक्षा में 

अब बस

शून्य ताका करती हूँ।

स्पर्श आपका माथे पर

अब भी महसूस 

किया करती हूँ!


चल रहा पितरों का,

हमारे अपनों का

श्राद्ध - तर्पण,

बिन जल,कुश तिल

कर रही मैं

अपनी संवेदनाये,

अपनी लेखनी

आपको अर्पण!

बेटी का आपके

बस यही तर्पण

बस यही तर्पण......







Tuesday, 1 September 2020

ज़िंदगी

 खुशियों से बस नहीं चलती है ज़िन्दगी

 ज़िन्दा रहने के लिए चाहिए ग़मो का दौर भी!


भाग भाग कर न जियो अपनी ज़िन्दगी

खुशियों को पनपने के लिए चाहिये, एक ठौर भी


फेंकने से पहले, खाने को देख लो

लाखों  हैं जिन्हें मिलता नहीं, एक कौर भी


चलती नहीँ ज़िंदगी, बस प्यार के सहारे

चाहिए जीने के लिए, ज़ुनून कुछ और भी!


क्या खोया ? क्या पाया, ज़िंदगी की शाम में

 करना कभी ,इन बातों पर गौर भी!

Monday, 24 August 2020

पारिजात

ओ पारिजात!

अथक कहानियाँ छुपाये तुम

मिथकों की खुशबू से

सुवासित कर जाते हो।

बन इन्द्र प्रिय 

सागर मंथन से निकले

तुम, देव तुल्य ,कहलाते हो!


सौम्य मन मोहन रूप से अपने

देवों को भी लुभाते हो

उर्वशी,कामदेव सबको 

वश अपने कर जाते हो!


पता है न पारिजात!

अलौकिक तुम्हारा रूप सुवास!

नितांत भोर की नीरवता में,

बिखर धरा, और 

अनुपम हो जाते हो!


ओ पारिजात

तुम्हारे,सूर्य प्रेम से

 अनभिज्ञ नहीं जग,

फिर क्यूँ सूरज से कतराते हो?

मित्र प्रेम के पात्र नहीं वो 

फिर क्यूँ

हिम, तुहिन सी स्वच्छ, श्वेत

पंच पंखुरियों में, 

रंग लालिमा, सूरज की

 अपने, हृदय मध्य छुपाते हो?


कहो पारिजात

मित्र रंग की निधियाँ

 क्यूँ एकाकी संभाले हो ?

उदय होते ही उसके, क्यूँ

झहर झहर झड़ जाते हो!


ओ पारिजात

अद्भुत,प्रणम्य

तुम्हारा विश्वास !

मौन से अपनी , मित्रता

 मुखर कर जाते हो

सुगंध, से अपनी 

हृदय में सबके, 

बस जाते हो।

सजते नहीं गुलदानों में,

देवों के चरणों में

मुक्ति तुम पाते हो

मुक्ति तुम पाते हो.......








 


Saturday, 22 September 2018

यादों का मर्तबान

मर्तबान सा बना लिया है
दिल को अपने
भर लिया है इसे
तुम्हारी यादों से!

नहीं लगने दिया है
वक़्त का फफूंद मैंने,
पसार कर,फैला देती हूँ
दिखा नेह का धूप
फिर संभाल रख देती हूँ।

पूनम की रात में
खोल मर्तबान का ढक्कन
बैठ जाती हूँ
खुश्बू में खो जाती हूँ
हो जाती हूँ
यादों की चाँदनी में सराबोर
पोर पोर में बसी सी
तुम्हारी यादों में
आकंठ डूब जाती हूँ

अमावस में भी
हाँ अमावस में भी
सालों से मर्तबान खोलती आयी हूँ
 नीम अन्धेरे में भी
जुगनुओं की रौशनी में
उन यादों को,संभालती आयी हूँ!

नहीं चाहती कोई देखे
मुझे तुम्हारी यादों के साथ
हो बस तुम और मैं वाली बात
याद है न
होती थी ऐसी ही
हमारी कई मुलाकात!

कुछ हसरतें, कुछ चुराये पल
सब इकट्ठे है
इस दिल के मर्तबान में
जब चाहा, खोल इसे
यादों को चख लेती हूँ
कभी नीम,कभी शहद सा
स्वाद इसका
बिल्कुल इश्क़ सा.....