Tuesday, 8 September 2020

प्रेम

 प्रेम


वो नहीं जानती

किसी गुलज़ार या अमृता को

ना ही सुने, पढ़े हैं उसने

ग़ालिब या मीर के शेर

नहीं जानती वो बयाँ करना

मुहब्बत को किसी अल्फ़ाज़ में

वो बस चाहती है जीना

मुहब्बत से मुहब्बत के लिए।


देखा है उसने सिनेमा में

मुहब्बत के कई रंगों को

पर कल्पना की उड़ान भर

ईंट, पत्थरों को ढोते उसके हाथ

बस देखते हैं उन

ईंटो से घर बनाते उन हाथों को 

और हो जाती है

वो आश्वस्त अपनी 

छत के लिए।


उसकी बड़ी-बड़ी निश्छल आँखें

ढूँढती हैं बहाने

ईंटो के लेन देन में

छूने को उसके हाथ

और छूकर उन्हें

वो ढूंढ लेती है

प्रेम के लिए एक ठोस सतह।


हरे-भरे खेतों से गुज़रते

पतली सी पगडंडी में

अठरंगी सपने देखती

वो लड़की करती है 

उस मजबूत हाथ वाले लड़के का इंतज़ार

जिसने कोई वादा नहीं किया

न दिया तोहफे में कुछ

अपनी मुस्कानों के आश्वासन के सिवा....

पर वो लड़की जानती है

और करती है, उन आँखों का भरोसा

जो उस लड़के के हाथ के 

पकड़ सी मजबूत है।

और यकीन है उसे 

प्रेम में यही,

सबसे ज्यादा ज़रूरी है.....

किसी लिखित अनुबंध से ज्यादा....


समीकरण

 प्रेम में पड़ी लडक़ी

नहीं देखना चाहती जीवन में

किसी तरह की विषमता।

ज़िन्दगी को जीना चाहती है

कविताओं के समीकरण से।

भागती हैं दूर गणित से,

नहीं भाता उसे

घटाव,भाग करना प्रेम में।

दो समानांतर रेखाओ के बीच

चलती दो ज़िन्दगियों को भी

समझ लेती है एक!

और कर बैठती हैं उम्मीद 

एक बिंदु पर,मिलने की।

चार हथेलियों की रेखाओं को

गिनती हैं एक

और,करने लगती है

अपने प्रेम को गुणित - एक से।

ज्यामितिय आकारों में भी

ढूंढ लेती हैं, प्रेम के आकार

और घूमती रहती हैं

 वृत की परिधि पर,

कुछ सपने संजोकर।

पर घूमती परिस्थितियों की परिधि पर

यथार्थ का जीवन प्रश्न देख

गणित से भागने वाली लड़की

सारे असमानताओं वाले

समीकरण सुलझा लेती है

आरे,तिरछे रिश्तों की रेखाओं को

जोड़,घटाव,गुणा,भाग से

हल कर जीवन का

शेषफल निकाल लेती है....

© अनुपमा झा

मज़दूर

 जिसे किया जा रहा अनदेखा 

बस वही अदना मजदूर, हूँ मैं

चुनाव की आन,बान शान 

संसद का मुद्दा,महान हूँ मैं।


ज़िन्दगी और मौत कंधे पर ढोए हमने

खून से सड़कों पर निशान बनाया है

नंगे पाँव, नाप गए राज्यों के सरहदों को

हमें न किसी ने अपनाया है,

हिम्मत और जुनून का ज़िंदा मिसाल हूँ मैं

पर,बस अदना मजदूर हूँ मैं।


राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं का

खुशबुदार पुष्पमाल हूँ मैं

विधानसभा,संसद में गूंजती

गरीबी की जयकार हूँ मैं

पैकेजों की घोषणाओं में होता

अग्रणी नाम जिसका

वो पहचान हूँ मैं

पर,बस अदना मजदूर हूँ मैं।


मारा न था,अबतक बीमारी ने

पर मारा बेरोजगारी ने

अंधकारमय भविष्य की लाचारी ने!

सूझा फिर एक छाँव अपना,

याद आया फिर गाँव अपना,

दो जून रोटी की खातिर

मैं भी तुम सब जैसे,शहर गया

क्या मैंने कोई गुनाह किया?

तुम सब जैसे बस,इंसान हूँ मैं!

बस अदना मजदूर हूँ मैं।


ज़ेहन में कौंधता

 एक सवाल पूछता हूँ मैं,

क्या बस प्रवासी हूँ मैं?

प्रान्तों गाँवो में बंटा

बिहारी,गुजराती, उड़ीया, राजस्थानी हूँ मैं?

जानता हूँ,गरीब,लाचार हूँ मैं

आपकी नज़रों में बेमानी हूँ मैं

 पर क्या नहीं हिंदुस्तानी हूँ मैं?

क्या नहीं हिंदुस्तानी हूँ मैं?

©अनुपमा झा



सावन

 सावन


आसमान में छाए बदरिया

मोहे गरज,गरज डराए बिजुरिया,

अब तो ,आजा मोरे साँवरिया,

यह सावन मुझे ,सताए है।


सूनी सेज डंसे हैं मोहे

पीर हिया की

कैसे समझाऊँ तोहे

राह तकत, नैन यह कैसे

देखो गए पथराए हैं।


ताकूँ हर राह,डगरिया

पूछू पता हर बाट, बटोहिया

प्रेम रंग है यह साँवरिया,

न कहना तू,मोहे बावरिया

कोयल,मोर,पपीहा सब

देखो मुझे चिढ़ाए है।


आसमान में छाए बदरिया

मोहे गरज,गरज डराए बिजुरिया

अब तो आजा मोरे साँवरिया

यह सावन मुझे सताए है…

यह सावन मुझे सताए है…

©अनुपमा झा

Monday, 7 September 2020

इंतज़ार

 मन का आँगन ,लीपे बैठी हूँ

देहरी पर दीप जलाये बैठी हूँ।


उम्मीद वाली जुगनुओं को

आँखों में सजाए बैठी हूँ।


उमस भरे दिवस के अवसान पर

बावली हवाओं को संभाले बैठी हूँ।


नेह सागर से कितने ही

यादों के सीप बटोरे बैठी हूँ।


आ जाओ अब कि मरु में

गुलमोहर,अमलतास के रंग लिए बैठी हूँ।

©Anupama Jha


नमक वाला प्यार

 विदा हो रही

बेटी के साथ

माँ बाँधती है

सब मीठा,

ताकि बनी रहे, मिठास

ज़िन्दगी में भी

मायके से भी!

पर बेटियाँ

बाँध लेती हैं

कुछ नमक ,

बिना कुछ कहे,किसी से,

समेट लेती हैं उनको आँखो में

चुपके से….


घुलता रहता है

मीठी ज़िन्दगी के बीच वो नमक

जिसे संजोती हैं बेटियाँ

बड़े जतन से,छुटपन से ही

जब से सुनी थी उसने

एक राजा और उसकी राजकुमारी वाली कहानी

"पिताजी मैं आपको नमक से भी 

ज्यादा प्यार करती हूँ"


आँखों में छुपाये नमक

गालों को छूकर

जब होंठ तक पहुँचते हैं

कर लेती हैं बेटियाँ, महसूस 

नमक वाला प्यार

अपने पिता के लिए

मीठी मीठी ज़िन्दगी में…

कभी भी,कहीं भी...

©Anupama Jha

मेघदूत

 मेघाच्छन्न नभ को देख

न जाने क्यूँ

हमेशा याद आता है

मेघदूत के श्लोक

और फिर उभरते हैं

बरसों से उमड़ते घुमड़ते

वही ख़्याल


क्या कोई कर सकता है

इतनी शिद्दत से इतना प्रेम?

बस,कवि की कल्पना मात्र 

ही तो है यह प्रेम !


पर सच कहूँ?

ढूंढती हूँ आज भी

घुमड़ते बादलों में

कोई प्रेषित संदेश

मुझे ढूँढती हुई

तुम्हारा संदेश लेकर!


तुम्हारे उस अंतिम खत 

का इंतज़ार आज भी है

जिसमें शायद कोई तो

जिक्र हो, तुम्हारी मजबूरियों का

या शायद, मुझे अंतर्यामी समझा तुमने!


कहीं पढ़ा है

हर स्त्री में एक शिव बसता है

सो,पी गयी गरल,!

गौतम में भी कहाँ थी हिम्मत

कुछ बता कर जाने की यशोधरा को!


पर दौड़ता, भागता, छुपता मेघ

शायद तुम्हारी याद दिलाता है

इसलिए लगा बैठती हूँ 

एक उम्मीद किसी संदेश की!


पर कल्पना की सोच पर

हकीकत की चमकती बिजली

अपने ज़ोरदार गरज से 

अपनी मीठी बूंदों के साथ

जज़्ब कर लेती है

कुछ नमकीन बूंदे भी,

प्यासी धरती में।

और मेघदूत की कल्पना

दब जाती है,मिट्टी में

होने को मिट्टी

मेरे प्रेम की तरह

तुम्हारे लिखे कुछ खतों की तरह….