Tuesday, 8 September 2020

कलम का इनकार

 आज कलम ने 

कविता लिखने से किया इनकार

 कहा उसने 

आदत डाल लो

न लिखने की 

खत्म होते पेड़ो को संभाल लो

खत्म होते कागज़ों को संभाल लो

हर रोड पर पड़े कागज़ी इश्तेहार में

मेरे मरने की ही तो खबर है

रौंदे जाते हो जिन्हें ,बेरहमी से तुम

मेरे नए निर्माण की फिक्र है तुम्हें?

कहाँ से लाओगे कागज़ तुम?

मत लिखो कविता पेड़ों पर

क्यों लिख रहे विलुप्त होते धन पर?

कविता तो लिखी जाती है 

नव किसलयों पर

वसंत पर

पत्तियों की हरीतिमा पर

फूलों पर

फूलों पर आती 

तितलियों पर

पेड़ो की छांव पर

उससे बंधे झूलों पर

पेड़ो को साक्ष्य बनाकर

सुने गए अनगिनत 

प्रेम निवेदन पर!

जब पेड़ ही न रहने वाले तो

क्यों उगा रहे अपनी पंक्तियां इनपर?

उगाना ही है अगर,

 तो उगाओ

अपने शब्दों जितने पेड़

आने दो हवा।

नई नस्लों को दो,

साँस लेने वाला माहौल!

फलों को चखने दो,उन्हें

पेड़ से तोड़कर खाने दो,

खेलने दो उन्हें पेड़ो की छांव में

फिर उनकी हंसी में 

देखो कविता

लिखो कविता

गाओ कविता

ऐसे मुझो मिलो तुम

 उदास सर्दियों की,लंबी शाम में

अचानक से

पुरानी डायरियों के बीच

मिल जाती है,बरसों पहले लिखी,

 कोई कविता जैसे

वैसे मुझे मिलो तुम।


बरसों बाद किसी अनजान शहर में

मिल जाये बचपन का दोस्त कोई

उस पल में मिली  खुशी जैसे

वैसे मुझे मिलो तुम।


गर्मियों की ठहरी दोपहरी में

बंद कमरे में,गुलज़ार के नज़्म

पढ़ते सकूँ जैसे

वैसे मुझे मिलो तुम।


गोधूलि के सिंदूरी आभा में

सुरमई धड़कनों के संग

शाम,प्रतीक्षारत रहती है जैसे

वैसे मुझे मिलो तुम।


दिन,रात की बेचैनी को

अपने आगोश में

क्षितिज समेटता है जैसे

वैसे मुझे मिलो तुम।

आँखे बंद हो मेरी, और

तुम आ जाओ अचानक 

 पीछे से "धप्पा"

"ढूंढ़ लिया तुम्हें " कहते

ऐसे मुझे मिलो तुम

फिर कभी न बिछड़ने के लिए.......

रतजगा

 #रतजगा


क्यूँ आ जाती है

तुम्हारी यादें?

बिना कुछ बताए

दबे पाँव-बेखटक!

रतजगे का मेरे

जैसे करती,इंतज़ार वो

और आती है तो जाती नहीं

कुछ चिपकू रिश्तेदार जैसे,

मेरे गम,मेरे ख़ुशियों से

कोई सरोकार,नहीं उसे

बस,आ जाती है

चुपके से-बेखटक!

मेरी अधमुंदी सी आँखो में

पढ़ लेती है

मेरी,अनकही बात

और याद दिला देती है

कुछ अधूरी,कुछ पूरी मुलाक़ात!

उठ,बैठ जाती हूँ फिर

उकेरने लगती हूँ,अपने जज़्बात!

पर,ये कागज़,मसी भी

नहीं देते मेरा साथ

विरह,लिखना चाहती हूँ

पर,प्रेम लिख जाती हूँ

मौन,होकर भी

वाचाल हो जाती हूँ!

लफ़्ज़ों में मेरे

कुछ यादें ही

चादर ओढ़े होती है

कुछ,गुज़रे वक़्त का

एतबार लिए होती हैं।

रतजगे का मेरे वो

इंतज़ार करती मिलती हैं

अधमुंदी,अधसोयी, आँखो में

बेखटक, किसी के आने का

गुमान लिए फिरती हैं.....

शहर



भीड़ ही भीड़ हर जगह

फिर भी तन्हा सा ये शहर

इमारतों के पीछे छुपा चाँद,सूरज

पता नहीं, कब होती रात यहाँ

कब होती है सहर?


बेहतरी की तलाश में

ख़्वाहिशों का यहाँ, भागता घोड़ा बेलगाम

लम्बी सड़क सी,अन्तहीन

ख़्वाहिशों का सफर ये शहर


खुद की परेशानियों में उलझे सब

हाल गैरों के,पूछने की फुर्सत कब

अपनेपन को तरसता ये शहर

अकेलेपन में बसता ये शहर!


न चबूतरा न खलिहान

चारों ओर बस मकान ही मकान

चारदीवारों में अपने,कैद सा इंसान

एक उन्मुक्त कैद सा ये शहर!


गाँव छोड़ आते जो,सपनों की गठरी बाँध

अपने अन्तहीन जरूरतों से परेशान

कभी होते सफल,कभी नाकाम

उम्मीदों के दीये,जलाता ये शहर!


एक अधूरी पहचान सा

 नाम सबका गुमनाम सा

गुमनानी में खुद को तलाशता ये शहर

सबके दिलों में फिर भी,रचता, बसता सा ये शहर


कुछ ज़मीनी हक़ीक़तों से दूर भागता ये शहर

अधुनिकता के नक़ाब से खुद को छुपाता ये शहर

डूबते सपने रोज़ यहाँ

उम्मीदों के पुल, बाँधता ये शहर

भीड़ ही भीड़ हर जगह

फ़िर भी कितना तन्हा सा है ये शहर.....


©अनुपमा झा

साजिश

 #साज़िश


मिलती,जुलती इच्छाएँ

मिलती,जुलती भावनाएँ

कुछ आशाओं को देती जन्म।


कुछ परिभाषाएँ मिल जाती

जीवन से,जीवन में

फिर होता उत्पन्न

एक रिश्ता-रूहानी सा।


कुछ अनकहे को समझ लेना

कुछ अनलिखे को पढ़ लेना

और जाना जुड़

ऐसे ही नहीं होता।


तय होता है -सबकुछ

जन्म, परिणय, मृत्यु से परे

एक बंधन

जो बंधते हैं

हर जन्म में

कभी तारे बनकर

कभी हम-तुम बनकर।

सब साज़िश है

तयशुदा आसमानी साज़िश

सारे ग्रह-नक्षत्रों ने की है मिलकर

एक आसमानी साज़िश

आकाश गंगा को साक्ष्य बनाकर

हमे- तुम्हें मिलाकर

है ना??

(#दोस्तो के नाम)

©अनुपमा झा

🌷🌷🌷🌷🌷

वहम

 वहमी हूँ मैं

हाँ, वहम पाल रखा है,

तुम्हारे होने का,

होता है एहसास,

तुम्हारे शब्दों का,

तुम्हारे छुअन का,

जो कहा नहीं तुमने

उन बातों को सुनने का,

और खुद,मुस्कुराने का

पता है लाईलाज है यह मर्ज़

कल्पनाओं की अद्भुत दुनियाँ में 

एकांत में

तुमसे वो सब कह देना

जो कभी न कह पाई

सब कितना सहज हो जाता है

इस मर्ज़ में!

पर जानती हूँ

और मानती हूँ

कुछ भी अकारण नही होता

इस ब्रह्मांड में।

इस वहम में भी

प्रजनन का बीज 

 होता है छुपा।

प्रसव की पीड़ा लिए

पैदा हो जाती हैं कुछ कविताएँ

कुछ हँसती, खेलती हैं

कुछ छुप या मर जाती हैं....

किसी के पढ़े जाने के डर से...

©अनुपमा झा

पर्यावरण संवाद

 #पर्यावरण #पर्यावरणदिवस


1*पेड़*


मत काटो मुझे

मत काटो मेरी बाहें

मेरी डालो को,

जटा बन आये

मेरे जड़ बालों को

बैठो,खेलो,कूदो

बाहों पर मेरे लगा लो झूले

बैठ जिसमे आसमाँ तू छू ले

ताज़ी हवा के घूँट कुछ भर ले

जी ले,बचपन,लड़कपन, जवानी

बुढापा,सब मेरे संग

लगने दो चौपाल

मेरे छाँव तले

देखो, न यहाँ

किसी का तन जले!

बनने दो घोंसला

सुनो तुम भी कलरव

न बनने दो,

वृक्ष बिन,यह जग नीरव


2 *हवा*

सुवासित बयार था मैं

स्वतंत्र, स्वछंद

अल्हड़,मगन,मस्त

खुश्बू लेकर आता था

मौसम का हाल सुनाता था

हर मौसम की 

अपनी खुशबू थी

हर मौसम की

अपनी मौसिकी थी।

जाने कहाँ खो गयी

कंक्रीट जंगलों में

वसंत भी कहीं छुप गयी


3*नदियाँ*

सदियों से बहती आयी हूँ

युगों युगों से प्यास बुझाती आयी हूँ

पूजिता रही सदैव

पीड़िता बन बैठा हूँ।

बना दिया मुझे

गंदे निष्कासन का गर्भ

बस होती हैं बातें

बड़ी बड़ी इस संदर्भ

खत्म होने के कगार पर हूँ

माँग रही सबसे भिक्षा

कर लो जल संरक्षण 

बस यही मेरी छोटी सी

तुम मनुष्यों से अपेक्षा।


4*पहाड़*

ऊँचा, महान,विशाल

यही थी मेरी पहचान

आधुनिकता की होड़ में

गुम हो रहा अस्तित्व मेरा

न कोई कर रहा मेरा सम्मान।

काट ,गिरा,ध्वस्त 

दिखा रहे,प्रगति का ज्ञान

दुखी है तुम सबसे 

ये पर्यावरण

सुन ले ए इंसान।


5*इंसान*

मूर्त बना सब देख रहा

पर्यावरण का हाल

एक दूजे को देकर दोष

आधुनिकता की होड़ में

हो रहा खुशहाल।