Tuesday, 8 September 2020

हिंदी

 हिन्दी

लहज़ा हूँ,ज़ुबान हूँ मैं

प्राकृत-संस्कृत ज़े निकली

मिटटी की गुमान हूँ मैं

गंग-यमुनी सभ्यता से बहती

लिपि देवनागरी जिसकी

वो हिंदुस्तान की पहचान हूँ मैं!

न तुम मुझे एक विषय से बांधो

बस,मेरी मूल्य तुम आंको!

विद्वानों की विद्वता हूँ मैं

व्याकरण की संचिता हूँ मैं!

राज्य भाषा नहीं बस 

करोड़ो की मातृ भाषा हूँ मैं

जन जन 

अपने वजूद को न

होते देखूँ लुप्त

वो अभिलाषा हूँ मैं!

सजे जो भाल पर हिन्द के

वो बिंदी हूँ मैं

हिंदुस्तान की हिंदी

हूँ मैं!

संभालो मुझे किसी धरोहर सी

भाषा की विनती हूँ मैं

हिन्दी हूँ मैं

हिंदी हूँ मैं!

शायद

 **शायद**


 कुछ अनकहे शब्दों में

कुछ अधूरे छन्दों में

कुछ अधूरे से सवाल में

कुछ उलझे से ख्याल में

तुम्हारे पुराने घर की दीवारों में

टिमटिमाते सितारों में

रतजगे के आलिंगन में

मासूम से चुम्बन में,

बंद पड़े लिफाफों में

खत के अल्फ़ाज़ों में,

किसी डायरी के पन्नों में

फँसी हूँ कुछ हर्फों में,

साथ सुने गीत में

यादों के मधुर संगीत में,

तुम्हारे अच्छे, बुरे ख़्वाबों में

तुम्हारी शहर की हवाओं में

तुम्हारी आस्था और विश्वास में

तुम्हारी चढ़ती, उतरती श्वास में

तुम्हारी दर्द भरी मुस्कान में

तुम्हारी अपनी पहचान में,

तुम्हारे नेह के गुमान में

शायद

मैं अब भी बाकी हूँ 

तुम में कहीं

शायद!!!


होली

 क्या खेलूँ मैं होली

हो ली मैं तो कान्हा की

रंगी हूँ उसके प्रेम रंग

चढे न मोहे कोई दूजा रंग

कौन सा रंग लगाऊँ अंग?

सखी सहेली हैं सब संग

हँसी, ठिठोली करे हैं सब

चित्त न कुछ लगे है अब

पीत की प्रीत लगे है जब

मन है रंगा ,श्याम रंग

भाव हो रहे सतरंग

ओ अली, अलि सी गुंजन करे है मन

फाग का रंग जलाए तन

क्या खेलूँ मैं होली?

मैं तो मन मोहन की हो ली

मैं तो साँवरे की हो ली......

भ्रम

 कभी हालात कभी जज़्बातों से

जुझते रहे हम

हँसते रहे कभी,

कभी घुटते रहे हम

कभी जुड़ते,कभी टूटते रहे हम

खुली,बंद आँखो से

बस सजाते रहे सपने

कहाँ चैन से सोते रहे हम!

समझौते करते रहे

कभी अपने, कभी अपनों से

जीतते और हारते रहे हम

दुनिया की भीड़ में

खुद को ढूँढते रहे हम

वज़ूद बनाने में 

खुद का वज़ूद भूलते रहे हम

बिखेरकर खुद को

खुद ही समेटते रहे हम

कांधे पर हमारे ही

टिकी है ये दुनियाँ 

बस इसी भ्रम में

जीते रहे हम.....

वो पुराना घर

 *वो पुराना घर*


ज़ेहन में आज भी

नींव उसी की पड़ी है

सालों बाद भी

सब यादें

वहीं की वहीं धरी है।

सालों से आज तक

सपने में दिखता आया

वही पुराना मकान है

जिसका हमारे पास 

सपनों के अलावा

न कोई नामों निशान है।।

बिक चुका है वो

फिर किसने दिया उसे अधिकार

जो कर लेता है

मेरे सपनों पर इख्तियार

क्यूँ देता है वो आज भी

मायके वाला प्यार?

आज भी नींद में

आराम से टाप जाती हूँ

वो घर की सत्रह सीढ़ियाँ

जहाँ देखी है हमने

 घर की चार पीढ़ियाँ

सुनी थी जहाँ

कभी सोहर कभी लोरियाँ।

छत पर जो सूखते थे

क़रीने से ढ़ेरों कपड़े

बन गयी हैं शायद

वो गीली लकड़ियां

यादों की आंच से सुलगती

वो लम्हों की कड़ियाँ

साफ दिखती जिसके धुएँ में

यूँ की यूँ गुज़रती सदियाँ।

फलों से लदे पेड़

पता नहीं हैं या नहीं

नहीं चाहती उन्हें याद करना

पर सपने में उग आता है

मुझमें फलों सा लद जाता है

उसकी मिठास में डूब जाती हूँ

फिर चाहकर भी 

आँखे नही खोल पाती हूँ।

शायद

पेड़ के साथ

जड़े भी मुझपर हावी हैं

आज भी वर्तमान से ज्यादा

भूत मुझमें बाकी है

नींद में ही सही

उस घर का हर कोना

घूम आती हूँ

अपना बचपन,अपना लड़कपन

फिर जी जाती हूँ

सपने में मायके का 

सूकून पाती हूँ।।



श्रृंगार

 नहीं करती मैं श्रृंगार

नहीं भाता मुझे फूल हार

नैनों के काजल

फैल नीर संग

पीर दिल की 

कह जाते हैं

व्यथा मन की मेरे

पूरे जग को सुनाते हैं।

नहीं लगाती कुमकुम,बिंदी

फैल तकिये पर जाती है

बेचैनी का मेरे वो

हाल सबको सुनाती है।

नहीं सुहाती खनकती चूड़ियाँ

रतजगे का मेरे

करती वो इज़हार

गिन गिन उनको करती मैं

प्रात का इंतज़ार

ये मुई पायल भी 

कहाँ मुझे भाती है

विरह वेदना मेरी

छम छम कर 

यह और बढ़ाती है

नहीं भाता मुझे

प्रिय तुम बिन 

कोई भी श्रृंगार

न ही भाते

फूल भी कोई 

गुलमोहर,गुलाब या कचनार

आवृत तुम्हारी नेह,से मैं

क्या करूँ कोई भी श्रृंगार

बस लेने से नाम,तुम्हारा

आती जो चेहरे पर लालिमा

रक्तिम आभा सी

 जाती है फैल

बस यही मेरा श्रृंगार

बस यही मेरा श्रृंगार

सुंदर काली स्त्री

 जरूरी नहीं

सब गोरी स्त्री सुंदर हो

कुछ काली भी होती है

मन के मिट्टी पर 

कल्पना के कपास उगाती है,

और

उड़ा देती है

अपने शब्दों को

फाहे में संभाल

आसमां की ओर

कभी 

संभाल लेता है आसमां

उन वजूदों को

कभी

 बरस भी जाता है

 आदतन

और फिर 

दब जाती हैं

हो जाती हैं भारी

वो सुंदर ,काली स्त्री.....