Monday, 22 May 2017

दीवार

दीवारें गूंगी लगती थी
एक कमरे की दीवार भी,
चारदीवारी लगती थी।
हुई जबसे शब्दों से मुलाकात
बढ़ा कुछ लिखने से ताल्लुकात,
दीवारें बोलने लगी
मुझे महफ़ूज़ करने लगी।
अब दीवारे भी खुश रहने लगी हैं
संग मेरे शब्द ,भाव उकेरने लगी हैं
नहीं अब सूनेपन का एहसास है
अब तो दीवार भी बन गयी
कुछ खास है
आये हैं सुनते
दीवारों के भी कान होते हैं
इसलिए ,दीवारों को भी
अपनी लिखी सुनाती हूँ
दीवारों संग हँसती, बतियाती हूँ....

व्यथा कलम की

मैं इतिहास रचने वाला हूँ,
एक इतिहास का हिस्सा बनने वाला हूँ
लुप्त हो रही, अहमियत मेरी
न रही इस बदलते युग में
पहले सी हैसियत मेरी
मैं क से कलम की तस्वीर
बनकर रहनेवाला हूँ
मैं इतिहास में बसनेवाला हूँ।
मैं हूँ कलम
हो रही अपना भविष्य देखकर
मेरी आँखें नम।

हस्ताक्षर भी अब हो गए डिजिटल
नहीं रही है ,मेरी कमी किसी को खल
मगन सब नए नए साधनों के प्रभाव में
नहीं जी रहे कलम के अभाव में
लेखनी रही मेरे बिन भी फूल फल।
ये देख,हो रही
मेरी आँखे सजल।

तुलना होती थी मेरी
कभी तलवार से
पूजा जाता था मैं,प्यार से
पाया जाता था ,जेब में सबके
आज उपेक्षित मिलता हूँ,
दुखी हूँ, खुद को बेबस पाता हूँ
अपनी व्यथा सुनाता हूँ।
रहा हूँ सिसक
लिए दिल में कसक
मैं हूँ कलम
हो रहीं है अपना भविय देखकर
मेरी आँखे नम.....

Friday, 19 May 2017

कबड्डी

भुलाना चाहूँ, भुला न पाऊँ
तेरी यादें
छुड़ाना  चाहूँ, छुड़ा न पाऊँ
तेरी यादें
 कबड्डी के सधे खिलाड़ी सी है
तेरी यादे।
गहरी लंबी साँस लिए
बार बार छूने आती है मुझे
तेरी यादें
अपने को बचाती हूँ
इधर उधर भागती हूँ
पर जीत कहाँ पाती हूँ,
कोशिश करती हूँ ,मैं भी
एक सधे खिलाडी जैसे
छिटकने की,दूर भागने की
फिर भी छू जाती हैं
तेरी यादें
तुम्हारे पाले में जाना नहीं चाहती
छूकर तुम्हें आना नहीं चाहती।
जाना पड़ता है,कई बार मगर
अपने को आजमाने के लिए
अपनी जिद को जिताने के लिए
जीतना है खुद को खुद से
पर हर बार हरा जाती हैं
तेरी यादे
कभी मैं तुम पर हावी
कभी तुम मुझपर।
ये सिलसिला यूँ ही
यादों का कभी
इस पाला, कभी उस पाला
कितनी सुहानी थी यह छुआ छुई
बना दिया है ,इसे खेल कबड्डी
तेरी यादे.....



भोर

हुई रात्रि घनघोर शेष
नहीं तम का कहीं अवशेष
रवि आया ,संग लालिमा ले
सिंदूरी हुई धरती की देह
निकल पड़े विहग
उन्मुक्त आकाश में
नव विहान,नव उल्लास
सुनो इनके कलरव मधुर ताल में
मस्त उपवन के ,फूल सारे
तितलियों के गूंजायमान में
सुरभित बयार,प्रकृति का उपहार
पुलकित मन इस
सुन्दर भोर में।

Tuesday, 16 May 2017

महानगर

मन मस्तिष्क में कोलाहल सा भर गया है
दिल भी कुछ तंग तंग सा हो गया है
आँखों में धुआँ धुआँ सा भर गया है
हर शख्स समस्याओं का अंतहीन
सड़क सा हो गया है
           लगता है
इंसान भी कुछ महानगर सा हो गया है.....

बुकमार्क (Bookmark)

बुकमार्क सरीखी हो गयी है ज़िन्दगी
रखकर जो भूल गए हो तुम,मुझे
ज़िन्दगी की किताब में
हर बात तुम्हें याद दिलाने की आदत सी हो गयी है
तुम्हारी ख़ुशी, तुम्हारे गम सबकुछ
तुम्हे ही बताने की आदत सी हो गयी है
ज़िन्दगी मेरी बुकमार्क सी हो गयी है
पन्ना दर पन्ना तुम्हे पढ़ती रही
शब्दों को तेरे देखती रही
तुम्हें समझती रही
अधूरी कहानी की नायिका की तरह
बाट तुम्हारा संजोती रही
     जानती हूँ
नहीं होता वजूद कोई बुकमार्क का
किसी कहानी किस्सो में
पर मैं बुकमार्क न जाने क्यूँ
तुम्हारी ज़िंदगी की किताब में
अपना वजूद ढूढ़ती रही
जहाँ पढ़ना छोड़ गए थे तुम
उसी पन्ने में
कहानी का अंत ढूंढती रही
अजीब सा रिश्ता तेरा मेरा
तू ज़िन्दगी की किताब
और मैं उस किताब की
         बुकमार्क......


उदगार

कितने ही भाव आते जाते
इस मन मस्तिष्क में
सबको पिरोकर ,सजाकर
हृदय के ताप का
उदगार लिखती हूँ।
कभी मादकता से ओत प्रोत
भावों का अभिसार लिखती हूँ
कभी श्रृंगार, कभी उन्माद
कभी प्रेम,कभी कटाक्ष लिखती हूँ
कभी पतझड़,कभी मधुमास लिखती हूँ
कभी तपती गर्मी,कभी शीतल बयार
लिखती हूँ
मन को झंझोरते भावों का
हिसाब लिखती हूँ
सतरंगी सपनों का
किताब लिखती हूँ
कभी किसी अनजान प्रिय पर
अपना अधिकार लिखती हूँ
मैं ह्रदय के ताप का उदगार
लिखती हूँ
बस उदगार लिखती हूँ......